कभी तो धूप होगी

कभी तो धूप होगी, कभी तो सहर से नज़रें मिलाऊँगा
सोचता हूँ जो तुम मिलोगे, तो कितना खुश हो जाऊंगा

की जब तुम आओगे, कभी तुम्हे तो कभी चौखट अपनी को देखूँगा
हाय, कही नज़र न लग जाये, काला टीका भी लगाऊंगा

कोने पे है जो परचून की दुका, वहां उधार थोड़ा ओर बढ़ाऊँगा
अगर मिल सका मुझे एक ओर दिल, तो वो भी खरीद लाऊंगा

मेरे साथ जब तुम चलोगे, तो थोड़ा डरूंगा और घबराउंगा
की चला नही कभी फरिश्तो संग, ये लहज़ा कहाँ से सीख पाऊंगा

की गुरबत झांकती है मेरे झरोको से, अमीर तो सपने भी न दिखा पाऊंगा
निवाले दो कमाए है आज मैंने, पर पहला तुम्हे खिलाऊंगा

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