एक हथेली और बढ़ा लेती है

एक हथेली और बढ़ा लेती है
और मांग लेती है कायनात सारी
वो बूढ़ी है, उसे सुबह उठना है,
दफ्तर जाते लोगो से मांगनी है खैरात सारी

रेज़गारी का ही तो बचा है भार सारा
ज़िन्दगी तो हो गयी है हल्की सारी
जब कोई थमा जाता है नोट गलती से हाथ में
उंगलियो को कागज़ की खा जाती है कशमकश सारी

मरहम भूख लगा देती होगी
आने ना देती होगी दुख की याद सारी
वो भी क्या घर होता होगा
जिसकी सुबह, पानी मिटाता होगा भूख सारी

मुझे उठना है, मुझे चलना है,
हर किसी की ज़िन्दगी की यही होगी कहानी सारी
बूढ़ी का वक़्त थमा है,
बस अब इंतज़ार अगले निवाले का, की कब रसीद हो
या फिर कब रुके ये नब्ज़ सारी की सारी

Comments

Popular Posts